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डॉक्टर से भाजपा विधायक की मारपीट मामले को दबाने पर ‘‘आप’’ विधायकों का अस्पताल प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन

  • August 22, 2025

भाजपा विधायक हरीश खुराना द्वारा डॉक्टर से की गई मारपीट और बदतमीजी मामले को लेकर आम आदमी पार्टी के विधायकों ने शुक्रवार को आचार्य भिक्षु हॉस्पिटल की मेडिकल सुपरिटेंडेंट ऑफिस के बाहर धरना प्रदर्शन किया। ‘‘आप’’ दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज के नेतृत्व में अन्य विधायक अस्पताल की एमएस से मिलने पहुंचे और अभी तक एफआईआर नहीं होने का कारण पूछा। सौरभ भारद्वाज ने बताया कि एमएस कह रही हैं कि उन्होंने मामले को ‘हल’ कर दिया है। इसलिए अब वो पुलिस में एफआईआर नहीं दर्ज कराएंगी। डॉक्टर को शिकायत वापस नहीं लेने पर करियर खराब करने की धमकी दी जा रही है। आरजी कर अस्पताल में भी प्रशासन ने न्याय नहीं होने दिया था और अब आचार्य भिक्षु अस्पताल की एमएस भी न्याय नहीं होने दे रहीं हैं। इस दौरान संजीव झा, विशेष रवि कुलदीप कुमार, जरनैल सिंह समेत अन्य विधायक मौजूद रहे।

आचार्य भिक्षु अस्पताल के बाहर प्रदर्शन के दौरान मीडिया बातचीत में सौरभ भारद्वाज ने कहा कि हमें जानकारी मिली कि जिस इंटर्न डॉक्टर के साथ गुरुवार को 11ः15 बजे भाजपा विधायक हरीश खुराना और उनके समर्थकों ने मारपीट और गाली-गलौज की, उस डॉक्टर और उसके परिवार पर राजनीतिक दबाव बनाया जा रहा है। उनसे कहा जा रहा है कि शिकायत वापस लो, वरना तुम्हारा करियर और जिंदगी बर्बाद कर देंगे। इस घटना को 24 घंटे से ज्यादा बीत चुके हैं, लेकिन एमएस उमा जी ने 42 डॉक्टरों की लिखित शिकायत, जिसमें एफआईआर दर्ज करने की मांग है, पुलिस को नहीं दी।

सौरभ भारद्वाज ने कहा कि आचार्य भिक्षु अस्पताल आते समय रास्ते में हमें थाना प्रभारी मिले, जिन्हें हम एमएस के कमरे में लाए। थाना प्रभारी ने साफ कहा कि एमएस ने उन्हें कोई शिकायत नहीं दी। हमने एमएस उमा जी से पूछा कि उन्होंने शिकायत पुलिस को क्यों नहीं दी? पहले तो उन्होंने कहा कि उनके पास कोई शिकायत आई ही नहीं। लेकिन जब हमारी डॉक्टर सेल की अध्यक्ष डॉ. निम्मी रस्तोगी ने चार पेज की शिकायत दिखाई, जिसमें 42 डॉक्टरों के हस्ताक्षर थे और जो सोशल मीडिया पर भी वायरल है, तो एमएस नाराज हो गईं।

उन्होंने कहा कि यह मेरा काम है, तुम कौन होते हो पूछने वाले? मैं तुम्हारी जवाबदेही नहीं हूं। हमने कहा कि हम जनता हैं, हमारे साथ निर्वाचित प्रतिनिधि हैं।। अगर एमएस डॉक्टरों को डराएंगी, धमकाएंगी, तो हम सवाल पूछेंगे। फिर एमएस ने कहा कि उन्होंने यह मामला हल कर दिया है और पुलिस को शिकायत नहीं देंगी।

सौरभ भारद्वाज ने कहा कि जब एसीपी आए, तो उन्होंने भी हमसे पूछा कि अगर मामला हल हो गया है, तो तुम्हारा इसमें क्या काम है? हमने एसीपी से साफ पूछा कि कोई ऐसा कानून या नियम बताएं, जिसके तहत एमएस को यह अधिकार हो कि वह एक आपराधिक मामले को हल कर दें। एक शिकायतकर्ता है, एक आरोपी है और यह एक आपराधिक मामला है। एक सरकारी डॉक्टर के साथ गाली-गलौज और मारपीट हुई, जो गैर-जमानती अपराध है। एमएस कैसे इस मामले में समझौता कर सकती हैं? उनके पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है। इस सवाल पर एमएस उमा जी उठकर चली गईं।

सौरभ भारद्वाज ने बताया कि इस पूरी घटना की रिकॉर्डिंग हमारे पास है। हमें पहले से अंदाजा था कि हमें किस तरह का व्यवहार मिलेगा, इसलिए हमने सब कुछ रिकॉर्ड कर लिया। हमें अनुभव है कि ऐसी परिस्थितियों में क्या होता है। हमारे पास सारे तथ्य हैं कि एसएचओ, एसीपी और एमएस सभी ने क्या जवाब दिया?

सौरभ भारद्वाज ने कहा कि आज दिल्ली में कोलकाता के आरजी कर अस्पताल जैसी घटना दोहराई जाने की कोशिश की जा रही है। वहां भी एक इंटर्न डॉक्टर के साथ हादसा हुआ था और वरिष्ठ अधिकारियों, एमएस और एमडी ने सरकार के साथ मिलकर मामले को दबाने की कोशिश की। आरोपियों को बचाया गया, जिससे जनता का गुस्सा और बढ़ गया। यहां भी वही हो रहा है। आरोपी भाजपा के मोती नगर विधायक हरीश खुराना हैं और उन्हें बचाने की कोशिश की जा रही है। 42 डॉक्टरों ने लिखित शिकायत दी, फिर भी एफआईआर दर्ज नहीं हुई। एमएस का कहना है कि उन्होंने शिकायत ऊपर भेज दी है और ऊपर के अधिकारी फैसला करेंगे।

सौरभ भारद्वाज ने एक्स पर कहा कि अस्पताल की एमएस और प्रशासन ने सरकार से सांठगांठ कर ली है। एमएस कह रही हैं कि उन्होंने मामला सुलटा दिया है। एमएस ने पहले कहा कि उनको किसी डॉक्टर से कोई शिकायत नहीं मिली है। फिर हमने शिकायत दिखाई तो कह रही हैं कि ये मैं तय करूंगी कि शिकायत पुलिस को देनी है या नहीं। कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में भी ऐसे ही अस्पताल प्रशासन ने दोषियों को बचाने की कोशिश की थी। अस्पताल की एमएस का फ़र्ज़ है कि डॉक्टरों के साथ मारपीट के मामलों में संस्थागत एफआईआर दर्ज़ करवाएं।

सौरभ भारद्वाज ने कहा कि अस्पताल की एमएस को संस्थागत एफआईआर कराने की इच्छा नहीं है। यदि वह इन्कार करती है, तो वह सीआरपीसी की धारा 154 (अनिवार्य पंजीकरण) का उल्लंघन कर रही हैं। आईपीसी के तहत अपराधों को दबाने के लिए उकसा रही है और चिकित्सा सुरक्षा अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन कर रही हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी एमएस (चिकित्सा अधीक्षक) को यह निर्णय लेने का अधिकार नहीं है कि डॉक्टरों या अस्पताल कर्मचारियों के खिलाफ हिंसा के मामलों में संस्थागत एफआईआर दर्ज की जाए या नहीं।

इस दौरान “आप” के प्रदेश उपाध्यक्ष व विधायक संजीव झा ने कहा कि  जब हम एमएस से मिले, तो उनका रवैया बेहद निंदनीय था। उन्होंने दावा किया कि उन्हें कोई शिकायत मिली ही नहीं, जबकि वह शिकायत टीवी पर चल रही है, सोशल मीडिया पर वायरल है और सभी के पास उपलब्ध है। अगर इतनी जगह शिकायत मौजूद है, तो एमएस को कैसे नहीं मिली? यह साफ दर्शाता है कि एमएस सरकार और भाजपा के साथ मिलकर डॉक्टर के साथ हुए दुर्व्यवहार पर कार्रवाई नहीं करना चाहती। आज न केवल आचार्य भिक्षु अस्पताल, बल्कि दिल्ली के सभी डॉक्टर सदमे में हैं। सभी डॉक्टर एसोसिएशनों ने इस मामले में कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने कहा कि एमएस की पहली जिम्मेदारी अपने डॉक्टरों को सुरक्षा देना है। एक तरफ दिल्ली की भाजपा सरकार अस्पतालों में पर्याप्त डॉक्टर, दवाइयां और सामान्य सुविधाएं तक मुहैया नहीं करा रही। डॉक्टर संकट की स्थिति में 12-16 घंटे काम कर रहे हैं। इसके बाद भी एमएस सरकार और भाजपा के साथ मिलकर आरोपी विधायक को बचाने की कोशिश कर रही हैं, जो बेहद निंदनीय है।

संजीव झा ने कहा कि इन छह महीनों में इस भाजपा सरकार के खिलाफ जनता में भारी नाराजगी है। झुग्गी-झोपड़ी वालों, अनधिकृत कॉलोनियों, बाजारों और व्यापारियों तक, हर कोई नाराज है। लोगों को लगता है कि उनकी बात नहीं सुनी जा रही। लेकिन मैं साफ कहना चाहता हूं कि लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं है। मारपीट की निंदा होनी चाहिए। हम इसका विरोध करते हैं। लेकिन अगर जनता की आवाज को दबाया जाएगा, तो लोग लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात उठाए। अगर कोई लोकतांत्रिक तरीके से सवाल उठा रहा है, तो उसकी आवाज को दबाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। हमारी मांग है कि एमएस तुरंत संस्थागत एफआईआर दर्ज करें, ताकि डॉक्टरों को सुरक्षा मिले।

उधर, इस बाबत डॉ. निम्मी रस्तोगी का कहना है कि डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा का मुद्दा बहुत पुराना है। भाजपा ने अपने मेनिफेस्टो में डॉक्टर्स के खिलाफ हिंसा मामले में प्रणालीगत बदलाव करने और एक्ट लाने का वादा किया था। लेकिन अब जब मौका आया है तो भाजपा का ही तंत्र डॉक्टर्स के साथ धोखा कर रहा है और मामले को दबा रहा है। यह छोटी सी चिंगारी बहुत बड़ी घटना बन सकती है। आम आदमी पार्टी हमेशा डॉक्टर्स के साथ है। हम इलीट कल्चर के खिलाफ हैं। विधायक एक आम आदमी से ऊपर नहीं है। विधायक एक सम्मानित डॉक्टर पर दबाव बनाता है कि मेरा इलाज पहले करो और उसके बाद विधायक डॉक्टर के साथ हाथापाई और अपशब्द करता है तो यह किसी को बर्दाश्त नहीं है।

*क्या है नियम?*

सौरभ भारद्वाज ने कहा कि अस्पताल के अंदर डॉक्टर पर हमले का कोई भी मामला संज्ञेय अपराध है। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और कई राज्य-विशिष्ट चिकित्सा सुरक्षा अधिनियमों के तहत, ऐसे मामलों की सूचना पुलिस को दी जानी चाहिए। अस्पताल प्रशासन/चिकित्सा अधीक्षक की भूमिका संस्थान की ओर से तत्काल एफआईआर दर्ज (संस्थागत एफआईआर) को सुगम बनाना और सुनिश्चित करना है।

*मामले को दबाने पर क्या होता है?*

कई चिकित्सा अधीक्षक, राजनेताओं और स्थानीय प्रशासन के दबाव में या अस्पताल की छवि खराब होने की डर से मामले को दबाने या समाधान करने की कोशिश करते हैं। लेकिन कानून उन्हें संज्ञेय अपराध की रिपोर्ट करने से इन्कार करने का विवेकाधिकार नहीं देता। यह कर्तव्य की उपेक्षा है। इसलिए, चिकित्सा अधीक्षक, डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा के मामलों में संस्थागत एफआईआर दर्ज करने के लिए कानून और जिम्मेदारी से बाध्य है। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो यह अपराध का दमन होगा और इसके लिए कानूनी परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

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