आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता व सांसद संजय सिंह ने दिल्ली में चल रही प्रीपेड टैक्सी योजना से जुड़े 112 कर्मचारियों को नौकरी से निकालने पर भाजपा की केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि इन कर्मचारियों ने पिछले 40 सालों से कड़ी मेहनत कर प्रीपेड टैक्सी योजना को सफल और लाभकारी बनाया था। अब अचानक इन्हें बाहर कर दिया गया है। सरकार बचे 38 कर्मचारियों को भी जल्द नौकरी से निकाल देगी। इतनी उम्र में अब ये लोग कहां जाएंगे? उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि सभी कर्मचारियों को वापस नौकरी पर लिया जाए और अपनी नई स्कीम में इन्हें समायोजित किया जाए।
बुधवार को “आप” मुख्यालय पर प्रेस वार्ता कर संजय सिंह ने कहा कि दिल्ली पुलिस ने करीब 40 साल पहले 1986 में प्रीपेड टैक्सी का कांसेप्ट निकाला था। इसके पीछे मंशा यह थी कि यात्रियों को सुरक्षित उनके घरों तक पहुंचाया जा सके। उस पर पुलिस की निगरानी का एक सिस्टम था और जो यात्री प्रीपेड टैक्सी के माध्यम से जाते थे, उनके लिए प्रीपेड टैक्सी बूथ होते थे। प्रीपेड टैक्सी के यात्री सुरक्षित पहुंच रहे हैं या नहीं, इसकी पूरी निगरानी होती थी और साथ ही साथ दिल्ली पुलिस अपनी सेवा के लिए यात्रियों से सर्विस चार्ज लिया करती थी। वह सर्विस चार्ज इतना पर्याप्त था कि उस सर्विस चार्ज के माध्यम से इस प्रीपेड टैक्सी को चलाने वाले कर्मचारियों की सारी तनख्वाह और सारा मेंटेनेंस दिल्ली पुलिस करती थी।
संजय सिंह ने आगे कहा कि जो इस योजना के मील का पत्थर थी और जिन्होंने दिन-रात मेहनत करके इस प्रीपेड टैक्सी के कांसेप्ट को सफल बनाया, ऐसे लगभग 150 कर्मचारी जिनको 850 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से सैलरी दी जाती थी, उनके दिन-रात के अथक परिश्रम के कारण इस प्रीपेड टैक्सी योजना में 10 करोड़ रुपये की एफडी थी। यानी कि यह मुनाफे की योजना थी। उन लोगों की दिन-रात की मेहनत की बदौलत 10 करोड़ रुपए का फिक्स्ड डिपॉजिट था। इसमें अभी अचानक दिल्ली पुलिस और गृह मंत्री को यह सूझा कि उन्हें इस पूरी योजना को एक अलग रूप में ले आना है। जो हजारों टैक्सी इस प्रीपेड टैक्सी योजना के तहत चलती थीं, उनको एक ऐप के जरिए वे अपने तरीके से संचालित करना चाहते हैं।
संजय सिंह ने कहा कि जो इस योजना को चलाने वाले मील के पत्थर थे, जो नींव के पत्थर थे, जिनकी मेहनत और परिश्रम की बुनियाद पर यह प्रीपेड टैक्सी योजना खड़ी हुई, ऐसे लगभग 112 कर्मचारियों को निकालकर बाहर कर दिया गया है। बाकी जो करीब 38 लोग बचे हुए हैं, उनको भी अब कुछ ही दिनों में निकालकर बाहर कर दिया जाएगा। उनका भी भविष्य सुरक्षित नहीं है।
संजय सिंह ने केंद्रीय गृह मंत्री और दिल्ली पुलिस के कमिश्नर से मांग की कि जिन लोगों ने इस प्रीपेड टैक्सी को दिन-रात के परिश्रम और मेहनत से 40 सालों में अपनी सेवाएं देकर मजबूत किया, उन लोगों को निकालने का काम न किया जाए। उनके परिवारों को भुखमरी की कगार पर पहुंचाने का काम न किया जाए। आज 60 साल, 50 साल और 55 साल की अवस्था में वे कहां जाएंगे? एक अंधेरे कुएं में उन्हें धकेलने का काम किया गया है, इस फैसले को वापस लिया जाए। सरकार जो भी अपनी योजना चलाना चाहती है, उसी योजना के अंतर्गत इन सभी 150 कर्मचारियों को यथावत रखा जाए जैसे वे पहले थे। डीओपीटी ने भी 1993-96 के दौरान इन्हें नियमित करने का निर्देश दिया था।
इसके दौरान एक कर्मचारी ने कहा कि पिछले कई वर्षों से हर सक्षम प्राधिकारी को पत्र लिखे गए लेकिन किसी ने बात नहीं सुनी। आज सांसद संजय सिंह ने यह मंच दिया है। दिल्ली पुलिस एक तरफ कहती है कि इसे न हानि न लाभ आधार पर चला रहे हैं, दूसरी तरफ सहकारी टैक्सी रेवेन्यू जनरेशन का बहाना लेकर 22 फरवरी से टर्मिनेशन लेटर देकर हमें हटा रही है। पिछले 40 वर्षों से हमें 25,000 रुपए से 26,000 रुपए सैलरी मिल रही है और 843 रुपए प्रतिदिन भुगतान करते हैं। वरिष्ठ अधिकारी इस समस्या का समाधान करें।
वहीं, कर्मचारी शहनाज ने कहा कि वह प्रीपेड काउंटर पर क्लर्क के रूप में काम करती हैं और बहुत से साथियों की जीविका इसी से चलती है। सहकारी टैक्सी की ट्रेनिंग के दौरान आश्वासन दिया गया था कि हमें निकाला नहीं जाएगा, बल्कि डिजिटलाइजेशन के जरिए टैब और वाईफाई देकर साथ काम करेंगे। लेकिन बिना किसी नोटिस के रातों-रात हमें बाहर कर दिया गया। हम दैनिक भोगी हैं, हमें कोई पेंशन या अन्य लाभ नहीं मिलता। कोरोना के समय भी हमने काम किया, जिसमें हमारे दो साथी संक्रमित होकर जान गंवा बैठे, लेकिन उनके परिवारों को कोई वित्तीय सहायता या नौकरी नहीं दी गई। भारत टैक्सी ने साथ मिलकर काम करने का दावा किया था, लेकिन हमें ही बाहर कर दिया गया। हम न्याय चाहते हैं और हमें नौकरी पर वापस लिया जाए।
एक अन्य कर्मचारी ने कहा कि यह लड़ाई 1986 से चल रही है। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से भी दो बार पुलिस कमिश्नर को आदेश मिला था कि इनका वर्गीकरण करके ‘समान काम समान वेतन’ दिया जाए, लेकिन उससे भी वंचित रखा गया। जब पहले कहा गया था कि बजट नहीं है, तब भी हमारी आय के स्रोत से खर्चे निकल जाते थे। अब जो 300 करोड़ का बजट जारी हुआ है, वह किस आधार पर हुआ है?