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आपराधिक मामले में उपराज्यपाल को संविधान में अभियोग चलाने से छूट का कोई प्रावधान नहीं है। अगर उपराज्यपाल किसी आपराधिक मामले में शामिल पाए जाते हैं तो उन भी पर मुकदमा चलाया जा सकता है। सोमवार को ‘‘आप’’ के वरिष्ठ नेता सौरभ भारद्वाज ने दिल्ली के एलजी वीके सक्सेना को लेकर गुजरात के कोर्ट के ताजा आदेश का हवाला देते हुए ये बातें कहीं। 2002 में साबरमती आश्रम में एक महिला पर किए गए हिंसक हमले में एलजी वीके सक्सेना आरोपी नंबर 4 हैं। उन्होंने कहा, एलजी ने अर्जी दी थी कि वे राज्यपाल से उपर और राष्ट्रपति से नीचे हैं। लेकिन गुजरात कोर्ट ने यह कहकर उनकी अर्जी खारिज कर दी है कि उपराज्यपाल को संविधान में कोई राहत नहीं दी गई है। कोर्ट के आदेश से साफ है कि एलजी अफसरों को आदेश देकर गलत काम करवाते हैं तो उन पर भी मुकदमा हो सकता है और एक आम आदमी की तरह उन पर भी आईपीसी की धाराएं लागू हो सकती हैं।

आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं कैबिनेट मंत्री सौरभ भारद्वाज ने पार्टी मुख्यालय में प्रेस वार्ता कर कहा कि सोमवार (कल) गुजरात के ट्रायल कोर्ट का एक बहुत ही दिलचस्प फैसला आया है। उस फैसले में अभियुक्त नंबर-4 की तरफ से अहमदाबाद के मुख्य अतिरिक्त मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट (चीफ एडिशनल मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट ऑफ अहमदाबाद) में एक अर्जी दी गई थी। दरअसल, 2002 में महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम में कुछ समाजसेवी, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार गुजरात दंगों के बाद एक शांति बैठक कर रहे थे। जिसमें शांति को लेकर चर्चा की जा रही थी। इसी दौरान कुछ असमाजिक तत्व साबरमती आश्रम में डंडे लेकर आ गए। इसकी वीडियो फुटेज में भी कुछ लोगों के हाथों में डंडे देखे जा सकते हैं। इस पवित्र स्थल पर चल रही शांति बैठक में असमाजिक तत्व महिलाओं को गाली देते हैं और उनके साथ धक्का-मुक्की करते हैं। घटना में शामिल दो लोग मौजूदा समय में भाजपा में हैं और विधायक हैं। शायद उस वक्त ये विधायक नहीं थे। इन लोगों के साथ उस घटना में एक शख्स और शामिल थे और वो दिल्ली के मौजूदा उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना हैं। यानी कोर्ट के सामने जो अभियुक्त नंबर 4 बताए गए हैं वो असल में दिल्ली के एलजी विनय कुमार सक्सेना हैं। उनके ऊपर 2002 से एक आपराधिक मामला चल रहा है और उसमें वीके सक्सेना अभियुक्त नंबर 4 है। उनकी इस घटना में बड़ी भूमिका थी।

“आप” नेता सौरभ भारद्वाज ने साबरमती आश्रम में हुई घटना का वीडिया भी दिखाया। वीडियो में एक महिला के ऊपर कुछ पुरुष हमला करते हुए देखे जा रहे हैं। उन लोगों ने महिला के साथ मारपीट की। सौरभ भारद्वाज ने कहा कि इस दौरान वह महिला अपनी जान बचाने के लिए एक कमरे की ओर भागी और उसने दरवाजा बंद कर लिया। यह महिला सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर हैं, जिन्होंने नर्मदा बचाओ आंदोलन की शुरुआत की और गुजरात में इनका नाम सभी जानते हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन के दौरान ही ये लोग संपर्क में आए।

उन्होंने कहा कि इस घटना के आरोपी नंबर 4 यानी दिल्ली के एलजी वीके सक्सेना ने गुजरात की कोर्ट में एक अर्जी लगाई है कि मैं अब कोई साधारण आदमी नहीं हूं, मैं एक संवैधानिक पद पर हूं इसलिए मेरे पास छूट (इम्यूनिटी) का प्रावधान है। एलजी ने कोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 361(2) राष्ट्रपति और राज्यपालों व राज प्रमुखों के संरक्षण के प्रावधान का जिक्र किया है। इस अनुच्छेद के भाग दो में लिखा है कि राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल के खिलाफ उनके कार्यकाल के दौरान किसी भी अदालत में कोई भी आपराधिक कार्यवाही न तो शुरू की जा सकती है और न ही जारी रखी जा सकती है। मगर यहां हैरानी की बात यह है कि दिल्ली के उपराज्यपाल कोई राज्यपाल नहीं है।

‘‘आप’’ के वरिष्ठ नेता सौरभ भारद्वाज कहा कि इससे भी ज्यादा हस्यप्रद बात यह है कि दिल्ली के उपराज्यपाल ने कोर्ट में दाखिल अपनी अर्जी में लिखा कि उपराज्यपाल का दर्जा राज्यपाल से भी ऊपर है। देश के कई अखबारों में भी यह बात प्रकाशित हुई है कि एलजी विनय सक्सेना ने तर्क दिया कि दिल्ली के एलजी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के राज्यपाल से ऊपर है, क्योंकि राज्य के राज्यपाल को केंद्र सरकार द्वारा चुना जाता है और भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है। इस मामले में गुजरात सरकार भी चुप रही है, जबकि उन्हें इसका विरोध करना चाहिए था। वह इसलिए चुप रहे क्योंकि वे चाहते थे कि एलजी को इस आपराधिक मामले से उस वक्त तक के लिए राहत मिल जाए, जब तक वे एलजी के पद पर बने हुए हैं। मगर एलजी ने अपनी अर्जी में यह कहा कि एक एलजी का पद राज्यपाल से ऊपर होता है। जोकि पूरी तरह से झूठ है।

वरिष्ठ नेता सौरभ भारद्वाज ने उदाहरण देते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति पहले लेफ्टिनेंट कर्नल बनता है और फिर कर्नल बनता है। इसी तरह, लेफ्टिनेंट जनरल और जनरल में भी जनरल का पद ऊपर होता है। इसी प्रकार, पहले लेफ्टिनेंट गवर्नर आजा है, उसके बाद गवर्नर आता है। यह बात तो छठीं कक्षा में पढ़ने वाला बच्चा भी जानता है कि किसी भी पद के आगे लेफ्टिनेंट लगाने का मतलब होता है कि यह एक जूनियर पोस्ट है। मगर एलजी साहब ने पूरे संविधान को ही पलट कर रख दिया। इन्होंने यह भी कहा कि लेफ्टिनेंट गवर्नर, गवर्नर से ऊपर और राष्ट्रपति से थोड़ा नीचे होता है। मुझे अच्छा लगा कि कम से कम एलजी साहब ने खुद को राष्ट्रपति से तो नीचे रखा है।

उन्होंने कहा कि एलजी ने कोर्ट के समक्ष अपनी अर्जी में बहुत ही कमाल की बात लिखी हुई है। इससे भी कमाल की बात यह हुई कि कोर्ट ने एलजी की अर्जी खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि एलजी को भारत के संविधान में ऐसी कोई छूट (इम्युनिटी) का प्रवाधान नहीं है। कोर्ट की इस टिप्पणी से कई रास्ते खुलते हैं। इसमें सबसे पहली बात यह है कि एलजी साहब रोज दिल्ली सरकार के विभिन्न विभाग में अधिकारियों से ऐसे काम करा रहे हैं, जो गलत हो रहे हैं। उसके लिए भी एलजी साहब के ऊपर कार्रवाई हो सकती है, क्योंकि इनके पास राज्यपाल की तरह कोई भी छूट या बचाव का प्रवाधान नहीं है।

‘‘आप’’ के वरिष्ठ नेता सौरभ भारद्वाज ने कहा कि एलजी साहब जब अपने आदेश पर कोई काम करवा रहे हैं और उसमें सरकार का पैसा खर्च हो रहा है तो उसके लिए उनकी जवाबदेही है। अगर वो कोई गलत काम करवा रहे हैं तो उनके ऊपर भी आपराधिक मुकदमा दर्ज हो सकता है, उसकी जांच हो सकती है। कोर्ट ने लिखित में यह बात साबित कर दी है कि ऐसे मामले में उपराज्यपाल के पास कोई छूट का प्रवाधान नहीं है। यह शर्मनाक बात है कि दिल्ली की जनता को यह पता चला है कि जिसे दिल्ली का एलजी बनाया गया है, उनका पूर्व में कैसा आचरण रहा है। जो व्यक्ति साबरमती आश्रम में घुसकर लाठी-डंडे वाले लोगों के साथ मिलकर गुंडागर्दी करता है और एक महिला के ऊपर हमला करता है उसे दिल्ली का एलजी बनाया गया है। इस घटना को 22 साल बीत चुके हैं लेकिन इन्होंने गुजरात में अभी तक इसकी पूरी जांच शुरू नहीं होने दी। क्योंकि गुजरात में भाजपा की सरकार है। इसलिए एलजी जांच को टालने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। वहीं, दिल्ली में अगर एक फाइल में तीन हफ्ते की देरी हो जाए तो सीधे मंत्री को चिट्ठी लिख देते हैं। दूसरी तरफ एलजी ने खुद अपनी जांच को 22 सालों से टाल रखा है और वे उसे आगे और टालना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि जब तक एलजी रहें उनकी जांच ही न हो। मगर संविधान में ऐसा नहीं होता है।

कैबिनेट मंत्री सौरभ भारद्वाज ने प्रेस वार्ता में साबरमती आश्रम की वीडियो साझा करते हुए कहा कि वीडियो में दिल्ली के एलजी विनय सक्सेना साफ दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस घटना में गैरकानूनी रूप से जमा होने के जुर्म में मुकदमा दर्ज हुआ है। कानून के अनुसार अगर गैरकानूनी रूप से जमा हुए लोग किसी की हत्या भी कर दें तो जितने भी लोग उस जमावड़े का हिस्सा होंगे उन सभी के ऊपर हत्या का मुकदमा चलता है। इसलिए दिल्ली के एलजी यह भी नहीं कह सकते कि इस घटना में महिला पर डंडे मारने वाला व्यक्ति कोई और है इसलिए मैं दोषी नहीं हूं क्योंकि कानूनी रूप से वह भी इस जुर्म करने के इरादे से गए साबरमती आश्रम पहुंचे समूह का हिस्सा थे। इसलिए वहां जो भी गैरकानूनी काम हुआ वे उसके बराबर के दोषी हैं।

आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता सौरभ भारद्वाज ने कहा कि वैसे तो एलजी मीडिया में काफी बातचीत करते हैं और अक्सर प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हैं। आम आदमी पार्टी की मांग है कि एलजी साहब मीडिया को यह बताएं कि क्या इस हमले के वीडियो में वो हैं या नहीं?

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